नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO): ऐतिहासिक विकास, सिद्धांत एवं वैश्विक प्रासंगिकता
Abstract
यह अध्ययन वर्तमान वैश्विक आर्थिक परिदृश्य के विकास, उसकी शोषक संरचनाओं तथा इसके उत्तर में उभरी 'नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था' (New International Economic Order - NIEO) की अवधारणा का विश्लेषणात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। वैश्विक राजनीति में यथार्थवादी सिद्धांत जहाँ शक्ति संतुलन को प्राथमिक मानता है, वहीं उदारवाद व नव-उदारवाद अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से परस्पर निर्भरता और सहयोग पर बल देते हैं। यद्यपि संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी वैश्विक संस्थाओं ने शांति और संवाद का मंच प्रदान किया, किंतु व्यावहारिक रूप से ये प्रायः विकसित राष्ट्रों के वर्चस्व और 'तृतीय विश्व' (विकासशील व अल्प-विकसित देशों) के आर्थिक शोषण का माध्यम बनीं।
उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के दंश से मुक्त हुए एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के राष्ट्रों ने इस असंतुलित व्यवस्था को चुनौती देने के लिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन, G-77, UNCTAD और G-15 जैसे मंचों के माध्यम से एक न्यायपूर्ण और समतामूलक व्यवस्था की मांग की। 1962 के काहिरा सम्मेलन से लेकर 1972 की UNCTAD रिपोर्ट, 1982 के दिल्ली सम्मेलन (दक्षिण-दक्षिण सहयोग) तथा बाद की G-15 बैठकों तक, NIEO के ऐतिहासिक विकास क्रम को रेखांकित किया गया है। अंततः, यह लेख वित्तीय व व्यापारिक असमानता, तकनीकी निर्भरता, बहुराष्ट्रीय निगमों (MNCs) के अनियंत्रित व्यवहार तथा कच्चे माल की शोषक कीमतों के विरोध में NIEO द्वारा प्रस्तुत सिद्धांतों का विश्लेषण करता है, जो वैश्विक आय और संसाधनों के समतामूलक वितरण पर बल देते हैं।
How to Cite This Article
पूजा (2026). नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO): ऐतिहासिक विकास, सिद्धांत एवं वैश्विक प्रासंगिकता . Journal of Frontiers in Multidisciplinary Research (JFMR), 7(2), 163-165.