‘एकात्म मानवतावाद’: समकालीन भारत में प्रासंगिकता
Abstract
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानवतावाद की अवधारणा बहुत ही अधिक प्रचलित हुई जो प्रमुख रूप से इस तर्क पर आधारित थी कि मानवीय एकता ही सम्पूर्ण सृष्टि का आधार है! व्यक्ति से ही गाँव, समाज, राज्य, राष्ट्र एंव, समस्त संसार का निर्माण होता है! अतः व्यक्ति को सदैव केंद्र में रखकर ही राष्ट्र निर्माण होना चाहिए! पंडित उपाध्याय जी अपने मानववाद की अवधारणा में धार्मिक एवं नैतिक तत्वों को जोड़ते हैं! उनका मानवतावाद मनुष्य में विभाजन को स्वीकार नहीं करता एंव उनका दर्शन इस धारणा पर आधारित है कि हिंदू संस्कृति भौतिक और अध्यात्म के जीवन मूल्य को प्रोत्साहित करती है!
इस लेख का उद्देश्य पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के एकात्म मानवतावाद की अवधारणा का समकालीन भारत में अवलोकन करना है! जिन विचारों को उनके द्वारा स्थापित किया गया, क्या उन्हें वर्तमान भारत में भी प्रासंगिक माना जा सकता है?
How to Cite This Article
पूजा (2026). ‘एकात्म मानवतावाद’: समकालीन भारत में प्रासंगिकता . Journal of Frontiers in Multidisciplinary Research (JFMR), 7(1), 523-526. DOI: https://doi.org/10.54660/.JFMR.2026.7.1.523-526